सर्वार्थ सिद्धि योग में मनाया जाएगा कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि
July 02, 2026
•
3 views
धर्म
नैनीताल: नैनीताल। हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत इस वर्ष 3 जुलाई 2026, शुक्रवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। भगवान श्री गणेश को समर्पित यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख, विघ्नों की शांति, धन-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। इस बार यह व्रत सर्वार्थ सिद्धि योग जैसे अत्यंत शुभ संयोग में पड़ रहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है।
शुभ मुहूर्त और ग्रह-नक्षत्रों का संयोग
ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी, गेठिया नैनीताल के अनुसार, कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी की तिथि 3 जुलाई को प्रातः 11:21 बजे से प्रारंभ होगी। इस दिन श्रवण नक्षत्र प्रातः 11:47 बजे तक रहेगा। चंद्रमा रात्रि 12:48 बजे तक मकर राशि में विराजमान रहेंगे।
इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण योग सर्वार्थ सिद्धि योग है, जो प्रातः 5:20 बजे से 11:47 बजे तक रहेगा। यह योग सभी प्रकार के शुभ कार्यों और पूजा-अर्चना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
चंद्र दर्शन के बाद ही होगा व्रत का पारण
संकष्टी चतुर्थी व्रत में भगवान गणेश की पूजा के साथ चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। इस बार चंद्रोदय का समय रात्रि 9:54 बजे बताया गया है, हालांकि विभिन्न स्थानों के अनुसार इसमें कुछ अंतर हो सकता है।
क्या है कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी का महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश सभी विघ्नों को दूर करने वाले और प्रथम पूज्य देवता हैं। कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से जीवन के संकट दूर होते हैं, संतान प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है, जो संतान सुख, स्वास्थ्य और आर्थिक उन्नति की कामना रखते हैं।
व्रत और पूजा विधि
* प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* भगवान श्री गणेश का ध्यान कर व्रत का संकल्प लें।
* पूजा स्थल पर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
* भगवान को दूर्वा, लाल पुष्प, सिंदूर, अक्षत, मोदक और लड्डू अर्पित करें।
* गणेश मंत्रों और गणेश चालीसा का पाठ करें।
* दिनभर व्रत रखें और शाम को पुनः गणेश पूजन करें।
* रात्रि में चंद्र दर्शन कर उन्हें अर्घ्य दें और उसके बाद व्रत का पारण करें।
कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत की कथा भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि द्वापर युग में माहिष्मती नगरी में महीजित नामक एक प्रतापी और धर्मात्मा राजा राज्य करता था। वह अपनी प्रजा का पालन पुत्रवत करता था, लेकिन स्वयं संतानहीन था।
समय बीतने के साथ राजा वृद्ध हो गया, लेकिन उसे संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ। चिंतित होकर उसने विद्वान ब्राह्मणों और प्रजा से इस विषय में परामर्श किया। तब ब्राह्मण और प्रजा समाधान की खोज में वन की ओर गए, जहां उन्हें महान तपस्वी और त्रिकालदर्शी महर्षि लोमश तपस्या करते हुए दिखाई दिए।
प्रजा ने महर्षि को अपनी समस्या बताई और राजा के लिए संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि लोमश ने कहा कि आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के व्रत और पूजा का विशेष महत्व है। उन्होंने बताया कि यह व्रत निःसंतान को संतान, निर्धन को धन और दुखी को सुख प्रदान करता है।
महर्षि के निर्देशानुसार राजा महीजित ने श्रद्धापूर्वक गणेश चतुर्थी का व्रत किया, ब्राह्मणों को भोजन कराया तथा वस्त्र और दान-दक्षिणा प्रदान की। भगवान गणेश की कृपा से कुछ समय बाद रानी सुदक्षिणा को एक सुंदर और गुणवान पुत्र की प्राप्ति हुई।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ इस व्रत का पालन करता है, उसके सभी कष्ट दूर होते हैं, शत्रुओं का नाश होता है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
धार्मिक मान्यता
मान्यता है कि कृष्ण पिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत श्रद्धापूर्वक करने से भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में आने वाली बाधाएं, संकट और दुख दूर होकर सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
— आलेख: ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी, गेठिया, नैनीताल

Comments
0 voicesLog in or sign up to comment
No comments yet. Be the first to share your thoughts!