ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026: शुक्ल योग, मूल नक्षत्र और सोमवार के दुर्लभ संयोग से बनेगा महाशुभ योग
June 27, 2026
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धर्म
नैनीताल: PahadisInIndia News Portal
ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026: शुक्ल योग, मूल नक्षत्र और सोमवार के दुर्लभ संयोग से बनेगा महाशुभ योग, जानें पूजा-विधि और पौराणिक कथा
इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत 29 जून 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। इस बार की ज्येष्ठ पूर्णिमा विशेष महत्व रखती है क्योंकि इस दिन शुक्ल योग, मूल नक्षत्र और सोमवार का अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ऐसे दुर्लभ योगों में किए गए धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, दान और निवेश अत्यंत शुभ फल प्रदान करते हैं।
शुभ मुहूर्त और ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति
ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि का आरंभ 29 जून को प्रातः 3:07 बजे होगा तथा इसका समापन 30 जून को प्रातः 5:26 बजे होगा। इस दिन मूल नक्षत्र अगले दिन प्रातः 4:04 बजे तक रहेगा, जबकि शुक्ल योग दोपहर 2:26 बजे तक रहेगा। इसके अलावा विष्टि करण शाम 4:17 बजे तक रहेगा। विशेष बात यह है कि इस दिन चंद्रमा पूर्ण रूप से धनु राशि में विराजमान रहेंगे, जिससे इस पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
क्यों है इस बार की ज्येष्ठ पूर्णिमा विशेष?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल योग और मूल नक्षत्र का संयोग अत्यंत शुभ माना जाता है। सोमवार का दिन भगवान शिव और चंद्रदेव को समर्पित होता है। ऐसे में इस दिन की गई पूजा-अर्चना, व्रत और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ कार्यों से रुके हुए कार्य बनने लगते हैं और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।
करें सत्यनारायण कथा और विष्णु-लक्ष्मी की पूजा
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन घर में भगवान सत्यनारायण की कथा करवाना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी प्रसन्न होते हैं तथा घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। इस दिन भगवान विष्णु को पीले पुष्प और मिठाई अर्पित करें तथा माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं।
ऐसा करने से व्यापार और नौकरी में उन्नति के योग बनते हैं।
चंद्रमा की आराधना से मिलेगा मानसिक शांति का लाभ
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की सकारात्मक ऊर्जा अत्यधिक प्रभावी होती है। यदि मन अशांत रहता है या तनाव बना रहता है, तो इस दिन रात्रि में चंद्रमा की रोशनी में बैठकर—
“ॐ सोम सोमाय नमः”
मंत्र का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। इसके साथ ही चंद्रमा को दूध, अक्षत और सफेद पुष्प मिश्रित जल से अर्घ्य देने से मानसिक तनाव में कमी आती है और मन को शांति प्राप्त होती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में वृन्दारक नामक एक विद्वान ब्राह्मण अपनी पत्नी देवसेना के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता था, किंतु संतान सुख से वंचित था। अनेक प्रयासों के बाद निराश होकर वह वन में तपस्या करने चला गया। वहां भगवान विष्णु ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए और उसे ज्येष्ठ मास का विशेष व्रत करने का उपदेश दिया।
भगवान के निर्देशानुसार वृन्दारक ने श्रद्धापूर्वक व्रत किया। इसी दौरान उसने एक भूखे बाघ पर दया दिखाते हुए अपने व्रत का पुण्य उसे अर्पित कर दिया, जिसके प्रभाव से बाघ को मोक्ष प्राप्त हुआ। बाद में वृन्दारक ने पुनः श्रद्धा से व्रत किया और उसे भगवान विष्णु का परम भक्त एवं तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ।
दक्षिण भारत में मनाया जाता है वट सावित्री पूर्णिमा व्रत
जहां उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या के दिन वट सावित्री व्रत मनाया जाता है, वहीं महाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत के कई राज्यों में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वट सावित्री पूर्णिमा व्रत मनाने की परंपरा है।
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आलेख: ज्योतिष आचार्य पंडित प्रकाश जोशी, गेठिया (नैनीताल)
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