“फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार!”: फूलदेई आज उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति का प्रतीक

by Ganesh_Kandpal

March 14, 2025, 11:12 a.m. [ 231 | 0 | 0 ]
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फूलदेई: उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति का प्रतीक

उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर में कई ऐसे लोकपर्व हैं, जो प्रकृति, समाज और परंपराओं से गहरे जुड़े हुए हैं। इन्हीं में से एक है फूलदेई, जिसे बसंत ऋतु के आगमन पर चैत्र संक्रांति के दिन मनाया जाता है। यह पर्व न केवल घर-आंगन की समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है, बल्कि बच्चों के लिए विशेष रूप से आनंददायक होता है। फूलदेई पर्व लोकसंस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामाजिक एकता का अनुपम संगम है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

फूलदेई का लोकपर्व और उसकी परंपराएं

फूलदेई पर्व का मुख्य आकर्षण छोटे बच्चे होते हैं, जो सुबह उठकर जंगलों और बगीचों से रंग-बिरंगे फूल—विशेष रूप से फ्योंली और बुरांस—इकट्ठा करते हैं। ये फूल घर-घर जाकर देहली पर बिखेरते हैं और लोकगीत गाते हैं—

“फूल देई, छम्मा देई,
दैणी द्वार, भर भकार।
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार, सुख समृद्धि अपार।”

इन लोकगीतों का गहरा अर्थ है—
• फूल देई: फूलों से घर-आंगन सुशोभित हो।
• छम्मा देई: घर में दया, करुणा और शांति बनी रहे।
• दैणी द्वार, भर भकार: घर धन-धान्य से भरपूर हो।
• ये देली स बारम्बार नमस्कार: घर की देहली को बार-बार प्रणाम किया जाए।
• फूले द्वार: घर का द्वार हमेशा सुख और समृद्धि से भरा रहे।

बच्चे जब फूल बिखेरकर आशीर्वाद की मंगलकामना करते हैं, तो घर के बड़े-बुजुर्ग उन्हें गुड़, चावल, मिठाइयां या कुछ पैसे भेंट में देते हैं। यह परंपरा बच्चों के मन में दया, प्रेम और समाज के प्रति सम्मान की भावना को विकसित करती है।

फूलदेई और बेटियों से जुड़ी परंपरा

उत्तराखंड में फूलदेई का एक और महत्वपूर्ण पहलू बेटियों को भिटोली भेजने की परंपरा है। फूलदेई के दिन से ही बेटियों के मायके से उन्हें भिटोली (स्नेह-उपहार) भेजा जाता है, जो पूरे एक माह तक चलता है। इसमें नए कपड़े, मिठाइयां, फल, और तरह-तरह के पकवान शामिल होते हैं। यह परंपरा बेटियों के प्रति प्रेम और सम्मान को दर्शाती है।

फूलदेई से जुड़ी प्राचीन कथा

फूलदेई पर्व की उत्पत्ति से जुड़ी एक प्राचीन लोककथा प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि पहाड़ों में घोघाजीत नामक राजा का शासन था। राजा की एक प्रिय पुत्री थी, जिसका नाम घोघा था। घोघा को प्रकृति से विशेष प्रेम था, लेकिन एक दिन वह अचानक लापता हो गई। राजा इस घटना से बहुत दुखी हुए।

राज्य की कुलदेवी ने राजा को सुझाव दिया कि यदि गांव के बच्चे चैत्र मास में फ्योंली और बुरांस के फूल एकत्र कर घरों की देहली पर चढ़ाएंगे, तो इससे घर-परिवार में सुख-समृद्धि आएगी। तब से इस परंपरा की शुरुआत हुई और इसे फूलदेई पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

पर्यावरण संरक्षण और फूलदेई का संदेश

फूलदेई केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन का भी प्रतीक है। इस पर्व के माध्यम से बच्चों को पेड़-पौधों, वनस्पतियों और जैव-विविधता के महत्व को समझने का अवसर मिलता है। जब वे फूलों को एकत्र करने के लिए जंगलों में जाते हैं, तो उन्हें प्रकृति की सुंदरता और उसकी उपयोगिता का ज्ञान होता है।

इसके अलावा, फूलदेई पर्व समाज में सामूहिकता, भाईचारे और सौहार्द को भी प्रोत्साहित करता है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना ही असली समृद्धि है।

नववर्ष की शुरुआत और चैत्र संक्रांति

भारतीय पंचांग के अनुसार, चैत्र मास से नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन उत्तराखंड में फूलदेई के साथ-साथ कई स्थानों पर गुड़ी पड़वा और नवरात्रि का पर्व भी मनाया जाता है। चैत्र संक्रांति का दिन नई ऊर्जा, नए संकल्प और नई उम्मीदों का प्रतीक होता है। फूलदेई इसी नववर्ष का प्रथम पर्व होने के कारण विशेष महत्व रखता है।

फूलदेई: एक सांस्कृतिक धरोहर

आज जब आधुनिकता के प्रभाव में हमारी पारंपरिक लोकसंस्कृतियां धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं, ऐसे में फूलदेई जैसे त्योहार हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। यह पर्व बच्चों, बड़ों और समूचे समाज के बीच स्नेह, सहयोग और परंपरा का सेतु है।

इस फूलदेई पर्व पर आइए, हम भी अपनी संस्कृति और प्रकृति को सहेजने का संकल्प लें।

आप सभी को फूलदेई पर्व 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं!
“फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार!”


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