होली: वैदिक सोमयज्ञ से लोक उत्सव तक: ✍ बृजमोहन जोशी

by Ganesh_Kandpal

March 9, 2025, 8:50 a.m. [ 70 | 0 | 0 ]
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भारतीय संस्कृति में पर्व और उत्सवों की एक लंबी परंपरा रही है, जो समय के साथ विकसित होती रही है। इन्हीं में से एक है होली, जो न केवल रंगों का पर्व है, बल्कि सामाजिक समरसता, ऋतु परिवर्तन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी प्रतीक है। इसका प्रारंभ वैदिक सोमयज्ञ के रूप में हुआ, जो आगे चलकर भक्त प्रह्लाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की पौराणिक कथा से जुड़ गया। कालांतर में यह मदनोत्सव, वसंतोत्सव और फागोत्सव का भी हिस्सा बन गया।

होली का वैदिक स्वरूप

प्राचीन वैदिक काल में जब नवीन अन्न पककर तैयार होता था, तब उसे देवताओं को अर्पित करने के लिए ‘नवनेष्टि यज्ञ’ किया जाता था। इसी अन्न को ‘होला’ कहा जाता था, जिससे इस पर्व का नाम ‘होलिकोत्सव’ पड़ा। यह यज्ञ न केवल नई फसल के स्वागत का प्रतीक था, बल्कि समाज में समृद्धि और उन्नति का भी प्रतीक माना जाता था।

होलिका दहन: असत्य पर सत्य की विजय

बाद में इस पर्व से भक्त प्रह्लाद, उनकी बुआ होलिका और हिरण्यकश्यप की कथा जुड़ गई। यह कथा हमें असत्य, अहंकार और अधर्म के विनाश का संदेश देती है। होलिका दहन का आयोजन इसी विजय का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि अत्याचार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंततः सत्य और भक्ति की जीत होती है।

होली का सांस्कृतिक और साहित्यिक योगदान

होली न केवल एक धार्मिक और सामाजिक पर्व है, बल्कि अभिव्यक्ति का भी पर्व है। इसीलिए इसे रंगों और लोक संगीत का उत्सव भी कहा जाता है। अनेक कवियों और लोक कलाकारों ने होली को अपनी लेखनी और गायकी से अमर बना दिया। नज़ीर अकबराबादी, अमीर खुसरो, कबीर, कविवर गुमानी, गौर्दा, महेशानंद गौड़, चारुचंद्र पांडे, उर्बा दत्त पांडे, तारी मास्साब और गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ जैसे रचनाकारों ने इस पर्व को नई ऊंचाइयाँ दीं।

गिर्दा ने होली पर कहा है:
“यसी होली अलिबेर रचै गयो रे।
ढूंग बै ल्हिबेर मानो जाणि बेची गयो,
अबीर गुलाल हरै गयो रे,
यसी होली अलिबेर रचै गयो रे….”

निष्कर्ष

आज होली केवल रंगों और उमंगों का पर्व नहीं रह गया है, बल्कि यह समाज को जोड़ने, प्रेम और सद्भावना का संदेश देने वाला पर्व बन चुका है। यह पर्व समाज में विद्यमान भेदभाव को समाप्त कर एक नई ऊर्जा और उल्लास का संचार करता है। यही कारण है कि होली को हर वर्ग और समुदाय के लोग मिलजुल कर मनाते हैं, जो इसकी सार्वभौमिकता और लोकप्रियता का प्रतीक है।

इस पावन पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ!
“रंगों में घुल जाए आपकी खुशियाँ और प्रेम का रंग कभी फीका न पड़े!”


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