by Ganesh_Kandpal
March 8, 2025, 5:23 p.m.
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उत्तराखंड की लोकभाषाओं के संरक्षण पर मंथन
कुमाऊँ विश्वविद्यालय में द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला सम्पन्न
नैनीताल, 8 मार्च 2025 – हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल, यूकॉस्ट और उत्तराखण्डी भाषा न्यास (उभान) के संयुक्त तत्वावधान में “उत्तराखंड की लोकभाषाएँ: संरक्षण और संवर्धन” विषय पर द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
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बोलियों का एकीकरण जरूरी – विशेषज्ञों की राय
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डॉ. हरिसुमन बिष्ट ने की, जबकि मुख्य वक्ता श्री पृथ्वी सिंह केदारखंडी, डॉ. हयात सिंह रावत, प्रो. चन्द्रकला रावत और डॉ. भवानी दत्त काण्डपाल रहे। मंच संचालन श्री सुल्तान सिंह तोमर ने किया।
मुख्य वक्ता श्री पृथ्वी सिंह केदारखंडी ने कहा कि उत्तराखंड की विभिन्न बोलियों को संगठित कर एक समरूप भाषा के रूप में विकसित करना होगा। डॉ. हयात सिंह रावत ने कुमाऊनी भाषा की समृद्ध लिपि और उसकी विधाओं पर प्रकाश डालते हुए इसके एकीकरण पर बल दिया।
प्रो. चन्द्रकला रावत ने कुमाऊनी और गढ़वाली के समानार्थी शब्दों की चर्चा करते हुए देवनागरी लिपि को इन भाषाओं के विकास के लिए उपयुक्त बताया। डॉ. भवानी दत्त काण्डपाल ने विभिन्न स्थानीय बोलियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
“बोलियों के शब्द विलुप्त हो रहे हैं, जिनका संरक्षण आवश्यक है, क्योंकि भाषा हमारी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी होती है।” – डॉ. हरिसुमन बिष्ट
धन्यवाद ज्ञापन पंकज पांडे ने किया।
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लोकभाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की जरूरत
तृतीय सत्र की अध्यक्षता श्री नीलांबर पांडे ने की, जबकि मुख्य वक्ता डॉ. शशि पांडे, डॉ. बिहारीलाल जलंधरी और श्री सुल्तान सिंह तोमर रहे। मंच संचालन डॉ. दीक्षा मेहरा ने किया।
मुख्य वक्ता डॉ. शशि पांडे ने मातृ भाषाओं के ज्ञान, उनके सतत विकास और हो रहे परिवर्तनों पर चर्चा की।
“लोकभाषाओं को जीवित रखने के लिए पत्र-पत्रिकाओं और पाठ्यक्रमों में इनका समावेश आवश्यक है।” – श्री सुल्तान सिंह तोमर
डॉ. बिहारीलाल जलंधरी ने कुमाऊनी-गढ़वाली भाषा के तुलनात्मक अध्ययन पर बात करते हुए समानार्थी शब्दों के संकलन और मानकीकरण को महत्वपूर्ण बताया।
इसके अलावा, मेधा नैलवाल ने उत्तराखंड की भाषाई विविधता पर अपने विचार रखे, शोध छात्रा शोभा ने बोली और भाषा के महत्व पर चर्चा की, तथा डॉ. नीमा राणा ने उत्तराखंड की भाषा पर वर्तमान परिवेश के प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त किए।
अंत में, प्रो. निर्मला ढैला बोरा ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कार्यशाला के समापन की घोषणा की।
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संगोष्ठी में जुटे कई विद्वान और शोधार्थी
इस अवसर पर डॉ. शुभा मटियानी, डॉ. कंचन आर्या, डॉ. दीक्षा मेहरा, डॉ. शिवांगी चनियाल, डॉ. कपिल कुमार, डॉ. दिव्या पाठक, जया राणा सहित ललित मोहन, सृष्टि गंगवार, शिवानी शर्मा, हिमांशु विश्वकर्मा, भगवती बिष्ट, पूजा, धीरज, देवेन्द्र, शोभा एवं अन्य शोधार्थी और प्रतिभागी उपस्थित रहे।
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निष्कर्ष – अपनी भाषाओं को बचाना जरूरी
यह कार्यशाला उत्तराखंड की लोकभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और एकीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए कई महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए, जो भविष्य में उत्तराखंड की भाषाओं को सशक्त बनाने में सहायक होंगे।
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